शिव चालीसा हिंदी में लिखित Shiv Chalisa Pdf Download Free-2024

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shiv chalisa pdf

हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरीके है उनमे से चालीसा का अधिक महत्व बताया गया है। उनमे से एक हमारे प्रिये शिव (भोलेनाथ ) की शिव चालीसा है। जिसमे भगवान शिव की स्तुति में रचित 40 छंदों का संग्रह है अर्थात इसमें 40 (चालीस) चौपाइयां है एवं श्री पार्वती पुत्र गणेश जी को अभिवादन करके शुरू होता है ।

Shiv Chalisa Hindi PDF

Shiv Chalisa Lyrics

शिव चालीसा की रचना तमिल विद्वान संत अयोध्यादास द्वारा की गयी थी। जो कोई भक्त शिव चालीसा का पाठ नियमित रूप से करता है उस भक्त को मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक शक्ति प्रदान होती है साथ ही जीवन में सुखमय और समृद्ध बनता है।

शिव भक्तों के लिए शिवरात्रि और सावन के महीने में शिव चालीसा का अत्यधिक महत्व है क्योकि ऐसा माना जाता है की माता पार्वती ने इस महीने में शिव को वर के रूप में पाने के लिए तपस्या की एवं साथ ही व्रत रखे थे। इसलिए भगवान् शिव को सावन का महीना बहुत ही ज्यादा प्रिय लगता है।

*ॐ नमः शिवाय *

शिव चालीसा का हिन्दी में अर्थ

॥दोहा॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

अर्थ- हे ! माता पार्वती पुत्र, अखिल मंगलो के ज्ञाता श्री गणेश की जय हो। मैं अयोध्यादास आपसे वरदान मांगता हूँ।

॥चौपाई॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

अर्थ- पार्वतीजी के प्राणाधार आपकी जय हो! आप साधु-संतजनों की रक्षा और लोगो पर दया करने वाले हैं।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अर्थ- हे प्रभु भोलेनाथ ! आपके ललाट पर चंद्रमा शोभायमान है और कानो में नाग के आकार का कुण्डल है।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

अर्थ- आपका शरीर गोरा है जो शांति और परिवत्रता दर्शा रही है। सिर की जटाओ से महिया गंगा जी बह रही है, संहारक रूप को दर्शाने के लिए मुंडों की माला पहन रखी है और शरीर पर भस्म लगा रखी है जो वैराग्य और तप का प्रतीक है।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥

अर्थ– हे नीलकंठ ! आपने बाघ की खाल के वस्त्र धारण किए हुए है और आपकी सौंदर्य छवि इतनी मोहक है कि नाग का मन भी मोहक हो रह है।

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

अर्थ- हिमालय की दुलारी माता पार्वती जी आपके बाईं ओर विराजमान है जो अत्यंत सुंदर और अनोखी लगती है।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

अर्थ- आपके हाथ में प्रभावशाली छवि दर्शाने के लिए त्रिशूल है, जिससे सदैव शत्रुओं का नाश करते रहते है।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

अर्थ- आपके पास नन्दी जी और श्री गणेश कुछ ऐसे विराजमान हैं जैसे लग रहा है जैसे समुद्र के बीचों बीच कमल खिला हो।

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

अर्थ- वहां पर पुत्र कार्तिकेय (मुरुगन) और गणेश जी विराजमान हैं। इस दृश्य की सुंदरता इतनी अद्वितीय है कि इसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

अर्थ- हे गिरिजापति ! जब भी देवताओं ने सहायता की पुकार की तब आपने बिना समय गवाए उन दुखो का निवारण किया।

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

अर्थ- जब दैत्य तारकासुर ने भारी उत्पात मचा रखा था, तब सभी देवताओं ने मिलकर आपसे संकटमोचन बनने के लिए प्राथना की।

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

अर्थ- तुरंत आपने अपने पुत्र कार्तिकेय (षडानन) को भेजा,उन्होंने पलक झपकते ही दैत्य को पराजित कर गिरा दिया।

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

अर्थ- आपने जलंधर नामक राक्षक का वध किया इस कीर्ति से पूरी दुनिया परिचित है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

अर्थ- त्रिपुरासुर नामक राक्षस से भयंकर युद्ध करके आपने अपनी करुणा से सभी देवी देवताओं को उस दुष्ट राक्षस से मुक्त करवाया।।

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

अर्थ- जब राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप किया तब आपने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर वचन निभाया।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

अर्थ- हे महेश्वर! दान देने वालों में आपके जैसा कोई नहीं है क्योकि इस सृष्टि पर भक्त लोग हमेशा गुणगान करते रहते है।

वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

अर्थ- वेदों में आपकी महिमा का गुणगान किया गया है,परंतु अनादि भेद होने से आपकी महिमा और रहस्य को समझ पाना असंभव है।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥

अर्थ– समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष प्रकट हुआ और इस विष के कारण देवता और राक्षस जलने लगे और संकट में पड़ गए।।

कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

अर्थ-हे शिव! आपने ज्वालारूपी विष का पान करके सभी पर दया की। जिससे आपका नाम नीलकण्ठ पड़ा।

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

अर्थ- हे महादेव ! भगवान् श्री राम सहस्त्र कमलों से आपकी पूजा कर रहे थे तब फूलों में रहकर आपने कठिन परीक्षाओं का सामना किया।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

अर्थ- जब आपने अपनी माया से एक फूल छिपा दिया तब भगवान राम ने अपनी आँखों के समान कमल से आपकी की पूजा करनी चाही।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

अर्थ- जब शंकर भगवान ने श्री रामचंद्र की की कठिन तपस्या देखी, तो वे प्रसन्न हो गए और उन्हें उसकी इच्छानुसार वरदान दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

अर्थ-अनंत और अविनाशी भगवान शिव की जय हो, जो सभी के हृदय में निवास करते हैं एवं कृपा करते हैं।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

अर्थ- हे भोलेनाथ! दुष्ट संदेह से हमेशा पीड़ित रहता हूँ। जिसके कारण मैं भटकता रहता हूँ और मुझे कभी चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

अर्थ-हे नाथ, मैं संकट में हूँ ,मेरी रक्षा करो ,मैं आपकी शरण में पुकार रहा हूँ। आप मुझे इन संकटों व कष्टो से कृपया मुझे बचा लें।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो॥

अर्थ-हे महेश्वर !आप अपने त्रिशूल से दुष्ट शत्रुओं का नाश करके मुझे इस संकटो से दूर मुक्त कराओ।

मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

अर्थ- घर में माता-पिता और भाई सभी होते हैं लेकिन संकट के समय कोई भी मदद के लिए नहीं पूछता।

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥

अर्थ- हे दुखहरन, सिर्फ आप ही मेरी एकमात्र आशा हो। आप आकर मेरे भारी संकट एवं कष्टो को दूर करो ।

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

अर्थ– हे महादेव! आप हमेशा निर्धन को धन देकर उनकी सहायता करते हो। जो भी आपके कोई कुछ मांगता है,वह फल आप उन्हें अवश्य हो ।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

अर्थ-हे नाथ, हम आपकी पूजा-अर्चना किस प्रकार करें? हमे यह मालूम नहीं; कृपया हमसे कोई भूल-चूक हुई है तो क्षमा कर दें।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

अर्थ- प्रभु आप ही संकटों का नाश करने वाले हैं। सभी शुभ कार्यो को कराने वाले हैं और सभी विघ्नों को दूर करके कल्याण करने वाले है ।।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥

अर्थ- योगी, संन्यासी,एवं मुनि सभी ध्यान लगाते हैं, जबकि देवी सरस्वती और नारद मुनि भी आपको नमन करते है।

नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

अर्थ- देवताओ में ब्रह्मा जैसे श्रेस्ठ देवता भी भगवान शिव का पञ्चाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय’ का जाप करके आपकी महिमा का पार नहीं पा सके।

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥

अर्थ- जो व्यक्ति मन लगाकर सच्ची निष्ठा भाव से पाठ को करता है, उसकी सहायता स्वयं भगवान शंकर करते हैं एवं सारी इच्छाएं पूरी करते है।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

अर्थ-जो भक्त कर्ज को लेकर परेशान है अगर वो नियमित रूप से पाठ करे तो वो पवित्र और ऋणमुक्त हो जाता है।

पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

अर्थ- जो व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की इच्छा से भगवन शिव की पाठ -पूजा करता है, उसे निश्चित रूप से भगवान शिव की कृपा से पुत्र की प्राप्ति होती है।

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥

अर्थ- हर भक्त एवं श्रृद्धालु हर महीने पंडित को त्रयोदशी के दिन बुलाकर पूजा एवं हवं अवश्य करावे।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

अर्थ- जो भक्त हमेशा त्रयोदशी का व्रत करता है, उसके शरीर में किसी प्रकार का रोग ,कष्ट एवं कलेश नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

अर्थ- भक्त को भगवान शिव के सामने धूप-दीप और नैवेद्य से पूजन करके आपकी मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठकर शिव चालीसा का पाठ करता है।

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

अर्थ- आपकी भक्ति से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते है एवं अंत में मनुष्य की आत्मा को शिवलोक की प्राप्ति होती है ।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अर्थ- अयोध्यादास कहते है कि हे नीलकंठ! मुझे आपसे आशा है। आप मेरे सभी दुखों एवं कष्टों को जानकर हर लो।

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।

तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।

अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

अर्थ- में हर रोज़ नियमित सुबह-सुबह शिव चालीसा का पाठ करता हूँ। हे जगदीश, मेरी मनोकामनाएँ पूरी करें। यह पाठ मार्गशीर्ष मास की छठी तिथि को हेमंत ऋतु में लिखा गया, शिव चालीसा के पाठ माध्यम से जीवन में पूर्णरूप से कल्याण और समृद्धि आती है।

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